Apne Apne Meghdoot By Poonam Ahmed
अपने अपने मेघदूत
द्वारा :
पूनम अहमद
विधा : कहानी
इंडिया नेटबुक्स द्वारा प्रकाशित
मूल्य : 225.00
पुस्तक समीक्षा क्रमांक : 106
प्रथम संस्करण : 2022
सरल सहज पठनीय एवं सुंदर यदि यह सभी खूबियाँ किसी एक लेखक में देखनी हो तो बेशक पूनम जी का नाम लिया जा सकता है, जो बोधगम्य भाषा , सरल प्रवाहमयी शैली एवं आम जन जीवन के बीच से लिए गए विषयों पर लिखने हेतु बखूबी जानी जाती हैं। इसके पूर्व मेरे द्वारा उनकी पुस्तक “मूनगेट” की समीक्षा की गयी थी जिसकी चारों कहानियों में नारी विमर्श को प्रमुखता से देखा गया था । उसके बाद उनकी पुस्तक “कोयले की लकीर” जो की कहानी संग्रह है उस की भी समीक्षा मैंने लिखी थी जिसमें भी नारी विमर्श प्रमुख है . प्रस्तुत पुस्तक जो की पुनः एक कथा संग्रह है , अपने आप में 19 खूबसूरत कहानियों का एक गुलदस्ता है जिसमें हर मिजाज की कहानियाँ उन्होनें कहीं हैं। कहानियां अत्यंत मनोरंजक , रोचक एवं आसान रोजमर्रा की भाषा में हैं, और विषय भी या तो सामान्य जनजीवन के रोजाना के मुद्दे हैं या फिर साधारण और परिवेश में सहज उत्तपन्न विषय हैं और यही कारण है की उनकी कहानियाँ बहुत कुछ अपनी सी लगती हैं।
भाषा सरल होते हुए भी अत्यंत प्रभावी है एवं
अपने सन्देश बखूबी देती है । जहाँ एक और उनकी कहानियों में भावनात्मकता मूल तत्व
होता है वहीं वे नारी विमर्श
केंद्रित कहानियों में नारी के मन के
अमूमन हर उस पहलू को उजागर करती हैं जो आम तौर पर अनदेखे कर दिए जाते हैं। विभिन्न
विषयों पर विचारों का उद्वेलन एवं नारी मन का अंतर्द्वंद कहीं खुल कर तो कहीं भावनाओं
अथवा विवश्ताओं की परतों तले गूढ़ता से उनकी कहानियों में नज़र आता है । उनकी नायिका वर्जनाओं एवं बेबुनियादी
मान्यताओं के खिलाफ जूझती है और अन्याय के सामने झुकती अथवा समझौता
करती हुयी नायिका उनकी कहानियों में नहीं है।
कहानी सच
ही तो कहा था : नारी
विमर्श केंद्रित है , कहानी एक ऐसी लड़की की है जो कि विवाह के पूर्व दुराचार का
शिकार हो जाती है । पुरुष मानसिकता व सामाजिक परिवेश को देखते हुए ,मां उसे शादी के बाद किसी को भी यहाँ तक की पति
को भी यह बात न बताने को कहती है, किन्तु
वह युवती अपने नवजीवन की नींव झूठ की बुनियाद पर नहीं रखना चाहती एवं जीवन साथी को
भी किसी प्रकार के धोखे में नहीं रखना
चाहती, इसीलिए परस्पर विश्वास एवं प्रेम के चलते अपने भावी पति को सब बात देती है,
उस वक्त तो वह युवक उस से कुछ नहीं कहता व
सहमत होते हुए विवाह भी कर लेता है परंतु शादी के बाद पति की दकियानूसी सोच व पत्नी अनछुई होने की गहरे तक बैठी धारणा
के चलते वह उसे नही अपना पाता , वहीं उसकी सास का रवैया अत्यंत सराहनीय है , जो
कि उनकी प्रगतिवादी सोच , नारी जागृति व नारी स्वातंत्र्य को दर्शाती है एवं उनके
कारण ही अंत में कहानी खूबसूरत मोड़ पर जा
पहुँचती है।
कुछ अनछुए विषय उन्होंने अपनी कहानियों में पात्रों के माध्यम से
उठाये हैं, एवं उनमें
जिस तरह पात्रों को समाज में व्याप्त मान्यताओं एवं बंधनों के खिलाफ आवाज
उठाते हुए दिखलाया है वह नि:संदेह काबिले तारीफ
है एवं समाज को जागरूकता का संदेश देती प्रतीत होती है । कहानी “पितृद्वय” में पूनम जी ने वह विषय उठाया है जो आम तौर पर अन्य
लेखकों की कलम में, संभवतः लज्जावश अथवा इस भय से की संभवतः पितृसत्तात्मक समाज पुरुष समलैंगिकता की बात को
स्वीकार न करे, इस सोच के चलते स्थान नहीं
पाते। दो उच्च शिक्षित समलैंगिक पुरुष जीवन साथी बन सभी तरह की मुश्किलों से
विशेषकर समाज के नश्तरों से एवं परिवार के विरोध से , दो चार होते हुए एक अनाथ बच्चे का पालन पोषण करते है व उसे एक सुखी सफल
जीवन देते हैं बहुत विस्तार से दर्शाया गया है । समाज की कुंठित मानसिकता पर सशक्त
प्रहार करती रचना है ।
जैसा पहले भी मैंने कहा है कि अपनी कहानियों में उन्होंने आम
जीवन की सामान्य घटनाओं को ,
रोज़मर्रा की छोटी छोटी बातों को ही कथानक बना लिया है तथा अत्यंत मनोरंजक व रोचक
प्रस्तुती की गई है । कहानियों के विषय के अनुकूल ही पात्र भी हमारे
बीच से ही होते हैं एवं बहुधा परिचित ही प्रतीत होते हैं ।
उनकी कहानियों में भावनाओं
को व्यक्त करने में एक सरलता
है जो उसे एक खूबसूरती प्रदान करती है। साथ ही वाक्य
संयोजन सामान्य है जो दिल में उठते
हुए भावों को बिना किसी
अतिरिक्त प्रयास के शब्दों में सुंदरता
के साथ प्रस्तुत कर देते हैं। हर कहानी एक अलग
भाव लिए अलग ही विषय पर है । लेखन मूलतः गूढ़ता के संग संग है अर्थात विषय वह नहीं है जो
स्पष्टतः प्रतीत हो रहा है एवं कथानक में
अपनी विद्यमानता उद्घोषित कर रहा है अपितु मूल प्रहार अथवा विषय वस्तु तो
गूढ़ता के संग उनके भाव में है जो प्रकट लक्षित नहीं है , व पाठक को उस सोच एवं
विचार तक पहुँचने हेतु निमंत्रित करती है। अतः उनकी कहानियों के कथानक को अत्यंत
गंभीरता से विचारित किया जाना अनिवार्य है। भावना
प्रधान लेखन है अतः गंभीरता
एवं गहराई से ही उसे समझना होगा। लेखन का तजुर्बा पुस्तक की प्रत्येक कहानी में में
स्पष्टतः दृष्टिगोचर है .
पूनम जी अपनी चिर परिचित शैली
में बिना लंबी चौड़ी भूमिकाओं के व कम से कम
पात्रों के साथ अपनी बात कह देती है व विषय निश्चय ही ऐसे होते हैं जिनपर हमारी भी नज़र
तो जाती है किंतु उसके आगे नहीं बढ़ते या कुछ गैर जिम्मेदाराना रवैया
दर्शाते हुए उसे उस गंभीरता से नहीं लेते जिस नज़रिये
और गंभीरता से पूनम जी लेती हैं । उनके प्रस्तुत कथा संग्रह की अगली कहानी है
“बेंच” : उम्र के उस दौर में जब वास्तव में
किसी साथ कि आवश्यकता होती है , उसी एकाकी जीवन की मुश्किलों
से रूबरू करती हुई कहानी है । कहानी पार्क की एक बेंच
के ज़रिए बुजुर्ग लोगों के अकेलेपन की समस्या को बखूबी उठाती
है आज के समय में जबकि अधिकांश घरों के बच्चे विदेश में हैं और मां बाप यहां अकेले
रहते है तब वे किन मुश्किलों में गुज़रते है उसका अच्छा खाका खींचा है और उस पर भी लेखिका की खासियत यह की वे
समस्या के साथ ही उसका हल भी प्रस्तुत कर देती है ।
“लियो”, बेजुबान प्राणी पर केंद्रित संग्रह की अगली कहानी है जो, किस प्रकार एक मूक प्राणी भला बुरा, नेकी बदी समझता है यह दर्शाती है। जहां लियो एक मूक जानवर अपने मालिक की मां के
द्वारा उसका विवाह उस की प्रेमिका से भिन्न किसी और लड़की से करवाने के निर्णय के
विरुद्ध अपने मालिक के लिए एक मानसिक संबल बन जाता है , उसे मानसिक आश्रय देता है
तथा एक सही फैसला लेने में मददगार साबित होता है । यह कहानी दर्शाती है की बेजुबान
कैसे दिल की बात समझ लेते हैं जो अपने करीबी इंसान भी नहीं समझ पाए या शायद अहं के
कारण समझना ही नहीं चाहते।
अपने अपने
मेघदूत :
चंद कहानियों के मूल में नारी और नारी से जुड़े विभिन्न मुद्दों को उठाया गया है। ऐसी ही एक कहानी है
अपने अपने मेघदूत जो
इस कथा संग्रह की शीर्षक कथा भी है । आज भी समाज की स्थापित
परंपराओं व रीति रिवाज को , रूढ़ियों को तोड़ कर, वर्जनाओं को झटककर स्त्री कुछ करना चाहे, कुछ बदलना चाहे भी ,
तो समाज उसे सहज ही स्वीकार नहीं कर पाता व उसे अपने लिजलिजे विचारों व कुत्सित
मानसिकता के चश्मे से देखता है। दिल की गहराइयों से किये गए प्यार की गंभीरता को बहुत
ही नफासत और सलीके से प्रस्तुत किया गया है । अपने प्रिय के न रहने पर भी उसकी जिम्मेवारियों
को उसका प्यार मान कर सहर्ष निभाना व
निभाते चले जाना , दिखावे वाले प्यार से कितना ऊपर होता है , यह अत्यंत खूबसूरती से दर्शाती
है।
“तुम होती तो”: कहानी है
एक ऐसे विधुर की जो पत्नी की अचानक मृत्यु हो जाने पर, पत्नी संग बिताए अपने पिछले जीवन पर पत्नी के
सर्वदा सहयोग किए जाने किन्तु स्वयं के
द्वारा पत्नी को उसका समय न दिए जाने पर क्षोभ दर्शाते हैं । हालांकि विधुर सम्पन्न हैं , बच्चे
भी संस्कारी है किंतु पत्नी का रिक्त स्थान उन्हें बहुत खलता है। इस उम्र में जबकि रिटायरमेंट के बाद साथी की
दरकार सर्वाधिक होती है और अब वो नहीं है तो जिन परिस्थितियों व मानसिक हालत से वे
गुजर रहे हैं वह सामने ला कर बहुतों की भावनाओं को शब्द दिए हैं। जो अनमोल पल वे पहले पत्नी को दे सकते थे वह समय
अब है भी तो पत्नी नहीं यही विडंबना दर्शाती हुई अत्यंत भाव प्रधान कहानी है।
कहानी “25 मिनिट की धूप” आज के बड़े शहरों की संघर्षशील
लिविंग कंडीशंस और वहां के कंक्रीट के जंगलों में बने
छोटे छोटे मकानों में थोड़ी सी धूप के टुकड़े के लिए की
जा रही ज़द्दोज़हद और मात्र थोड़े से समय के लिए फ्लैट
में आने वाली धूप से मिलने वाली खुशी को बयां करती है । कहानी बस इतनी सी ही है ।
कहानी “अपना घर” एक ऐसी कहानी है जिसमें रिटायरमेंट के बाद अपने
बच्चों के पास रहने के लिए पहुचे बच्चों के व्यवहार से दुखी माता पिता का जिक्र
किया गया है, जो पहले तो अपने बेटे बहू के पास रहने जाते हैं किन्तु बहु उन्हें अपने व्यवहार के द्वारा इस
तरह से एकाकी बना देती है की वे स्वयम ही समझ जाते हैं की वे उस घर में अनचाहे
मेहमान हैं एवं बहू को उनका घर के किसी भी काम में किसी भी तरह का किसी भी तरह का
दखल पसंद नहीं है ।
वहाँ से परेशान हो वे अपनी बेटी दामाद के पास
पहुचते हैं किन्तु वहाँ भी उन्हें घर के सारी काम काज करने की जिम्मेवारी सौंप दी जाती
है , काम वाली भी हटा दी जाती है , वे ऐसे
हो जाते हैं जैसे उस घर को नए नौकर मिल गए , लड़की दामाद तो निश्चिंत हो जाते हैं ,
किन्तु कुछ समय बाद जब वे अपनी असमर्थता जाहिर करते है त्यों ही लड़की दामाद का
व्यवहार बदल जाता है । अंत अत्यंत रोचक , रोमांचक, व अप्रत्याशित है ।
एक और कहानी “कॉन्टैक्ट्स
“ पहली तो चोट करती है वर्तमान व्यवस्था पर जिसमें जोड़-जुगाड़, प्रतिभा से ऊपर हो
गए हैं एवं बिना संपर्क , सोर्स सिफारिश के कोई काम बन पाने का प्रश्न ही नहीं उठता । तो दूसरी एवं
कहानी की मूल बात है वह यह की मां, जिसे
सब घरेलू महिला समझ कर उसे कम महत्व देते हैं वही आवश्यकता के समय अपने संबंधों व
सेवा भावी गुणों के कारण कैसे बेटे की नौकरी एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में लगवाने में कामयाब हो जाती है तब जाकर वह परिवार
में सभी के दिलों में यह बात स्थापित कर पाती है की उसका भी महत्व कम नही आँका जाना चाहिए ।
कथा संग्रह की अन्य कहानियाँ भी
अत्यंत रोचक हैं , अर्थपूर्ण है साथ ही भाव प्रधान हैं। सब कहानियाँ पढ़ कर सबसे
अच्छी बात जो हुई वह यह थी की किसी तरह का भारीपन या बोझ जैसा महसूस नहीं हुआ ।
हाँ कुछ अच्छा पढ़ने का सुकून अवश्य ही मिला।
शुभकामनाओं सहित,
अतुल्य


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें